Tuesday, September 11, 2018

世卫组织敦促中国加强食品安全管理

鉴于中国的奶粉、玩具以及宠物食品等一系列事件,联合国世界卫生组织提醒中国在食品及商品安全问题上完善法制,统一食品安全管理体系,并健全信息通报系统。

该组织负责人安东尼·哈泽德说:“一个有效的食品安全控制系统应由统一的食品生产和消费法律、法规组成。这样,外国的政府和消费者才能信任中国政府批准合格的产品。”

据《路透社》报道说,中国认识到需要对食品安全管理进行整治。但是该国幅员辽阔,政府机关繁杂,食品质量管理长久以来就是个问题,这中间存在着管理不够统一,政令和法律实施薄弱等问题。地方官员有时助长非法商业操作,而中央政府很难加以管理。

在最近发生的三聚氰胺事件中,上千的中国儿童由于食用了毒奶粉而患病,至少有4名儿童死亡。因此,世界各地的很多商店开始停售相关的一系列含三聚氰胺的食品和饮料。

世界卫生组织安全部主管约翰·施隆德就“毒奶粉”事件说,中国政府在食品管理中存在着多头管理、权责不明等问题,因而出现了信息不畅、对事件反应迟缓的现象。
明年开始实行的这一项目将成为日本最大的减排交易。但是环境保护主义者表示,仅靠这项计划是不够的,日本仍需为减排做更大努力,而且该计划不一定可行。

环境部长齐藤铁夫说,这一计划的目的是抵消市场对私营部门的影响,并促进后者通过技术改进而节约能源并减少排放温室气体。“这一计划是在自愿基础上进行的,我们希望尽可能多的公司从一开始就加入进来。它最终将会变成强制性的。”

日本作为世界第五大温室气体排放国,一直不愿设定排放上限,因为日本的公司为减排做出了很有成效的努力。根据《京都议定书》,日本与其他36个发达国家一样受到减排约束,但是这一协定将于2012年到期。
据《路透社》报道,数百名民众因未能在一植树项目中收回投资而到北京政府寻求帮助。该传销项目宣称民众可通过在内蒙古地区大量植树造林而致富。他们在抗议过程中与警察发生了冲突。

8年内可获高额回报的承诺吸引了3万多名投资者,通过购买树苗对内蒙古北部贫瘠地区进行投资。投资总额达13亿元人民币(约1.9亿美元)。大多数投资者已退休。

中国近年的农村改革允许农民转让土地使用权。该公司因此从农民手中得到了土地。但是今年上半年因传销诈骗而被媒体曝光。

抗议者抱怨说,该公司被调查后,资产被冻结,而其在内蒙古地区的树林因无人照管而荒芜。“这本该是绿化沙漠的好事,”一位北京市民说,他在这项传销计划中损失了10万元人民币(约1.47万美元)。“植树总量约为72万亩(4.8万公顷),但40%没能存活。”
据《卫报》报道英国林地信托的一份报告说,英格兰古树林,即那些有着超过400年历史的林地,遭砍伐的速度比亚马逊雨林还要快。在过去80年里,几乎一半的林地已经遭到破坏,超过600个正在因为修建道路、输电塔、住宅楼和进行机场扩建等原因而受到威胁。

该组织的负责人艾德⋅潘文说:“这些古树林的价值和热带雨林差不多,对于英国来说是不可取代的。这里有很多珍贵物种和受威胁的野生动物物种。这些古树林是我们的历史宝藏,一旦被破坏就无法修复了。”

他说,虽然很多古树林的科学重要性和保护意义得到了认可,85%的树林,包括12个最大的古树林在内并没有得到相应的价值认定。地产开发商大可在漏洞百出的保护规划系统中钻空子,牟取赢利。

英国现在仅有1,193平方英里(  公顷) 古林地,这是杨柳山雀、沼泽山雀、宽耳蝠和睡鼠等本地物种赖以生存的地方。其中,为数不多的林地面积在50英亩 (约20公顷)以上,只有14个面积超过740英亩 (300公顷)。
 

Friday, September 7, 2018

जहां फ़सल के साथ महिला किसानों की लाशें उगीं.

वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती. लेकिन जब उसकी शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गई. कुछ नहीं तो मेहमानों को सादा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था. इतने भी पैसे नहीं बनते थे. कहां से करते शादी? मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं. बस एक दिन अचानक चली गयीं”
यवतमाल का पिपरी बुट्टी गांव :
“सब जगह ढूंढा पर मां नहीं मिलीं...फिर गांव के बाहर के कुएं पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुएं के बाहर पड़ी थी.
खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे, मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ. फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”
यवतमाल का ही वागधा गांव:
“कागज़ों पर हमारा कर्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार कर्ज़ था. जिन माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों से हमने कर्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़, हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद माँ बच जाती”.
राजधानी दिल्ली से लगभग 1200 किलोमीटर दूर स्थित महाराष्ट्र का अमरावती जिला बीच मानसून की हल्की फुहारों में भीगा हुआ है. चौड़ी सड़कें, चौतरफ़ा हरियाली और राज्य के विदर्भ इलाक़े में पड़ने वाले इस जिले का इंद्रधनुषीय आकाश आपके आसपास ख़ुशहाली का भ्रम रचता है.
लेकिन टीक के पेड़ों और काली मिट्टी के खेतों से सजे यह ख़ूबसूरत रास्ते विदर्भ के जिन गांवों तक जाते हैं, वहां अवसाद और दुख के सिवा कुछ नहीं है. पर विदर्भ के इस दुख के कारणों और इससे जुड़े आंकड़ों में जाने से पहले आइए आप को ले चलते हैं जिले की तिवसा तहसील में बसे शेंदुरजना गांव.
इस गांव में रहने वाले भास्कर और देवकू राव असोडे का घर ढूँढने के लिए हमें ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता. गांव का हर बाशिंदा उस किसान के बारे में जानता था, जिसकी 2 जवान बेटियों ने हाल ही में बढ़ते क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली थी.
यादातर पुरुष किसानों की आत्महत्याओं के दस्तावेज़ों से अटी विदर्भ के कृषि विभाग की फ़ाइलों में दर्ज 24 वर्षीय माधुरी और 21 वर्षीय स्वाति की यह कहानी राज्य की ‘किसान बेटियों’ के हिस्से आने वाले संघर्षों की दास्तान है. कीचड़ भरी एक अंधेरी गली पार करके हम हरी दीवारों वाले एक ऐसे घर के सामने पहुंचते हैं, जिसके मुख्य दरवाज़े पर बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर का एक विशाल पोस्टर चिपका हुआ है.
भीतर दाख़िल होते ही हमारी मुलाक़ात 45 वर्षीय देवकू असोडे से होती है. नारंगी रंग की मटमैली साड़ी पहने अपनी रसोई में बैठी देवकू सब्ज़ी काट रही थीं. हमें देखते ही उन्होंने रोना शुरू कर दिया. एक ग्लास पानी पीने और 5 मिनट की ख़ामोशी के बाद देवकू ने हल्की आवाज़ में बोलना शुरू किया. दोनों ही बार मुझे अंदाज़ा नहीं हुआ कि मेरी बेटियां ऐसा कुछ कर करने वाली हैं. खेती के लिए हमें कर्ज़ा लेना पड़ा था. कर्ज़ा चुकाने को लेकर तनाव भी रहता है. लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कदम उठा लेंगी”.
बेटियों की फ़्रेम करवाई हुई तस्वीरें गोद में लिए बैठी देवकू के गमगीन चेहरे पर रसोई की खिड़की से गिरती धूप पड़ रही थी.
“बड़ी वाली उस दिन बिल्कुल सामान्य थी. उसने सुबह उठकर घर की सफ़ाई की. खाना बनाया. फिर बाल धोकर नहाई और खाना खाया. इसके बाद अचानक शाम के 4 बजे उसने ज़हर (कीटनाशक) खा लिया. तीन महीने के अंदर ही छोटी वाली ने भी ज़हर (कीटनाशक) पी लिया. वह भी पूरे दिन ठीक थी. शाम को टहलने छत पर गयी थी. वहीं उसने ज़हर पी लिया”
कहते कहते देवकू रुआंसी होकर दीवार को देखने लगती हैं. वर्षीय भास्कर राव असोडे बताते हैं कि उनकी बेटियों की मौत के बाद से उनकी पत्नी देवकू डिप्रेशन और मानसिक अस्थिरता का शिकार हो गईं हैं.
भास्कर को अपनी ‘किसान बेटियों’ पर आज भी नाज़ है. लेकिन बेटियों की तस्वीरों पर दर्ज उनकी मौत की तारीखें देखकर बीच-बीच में उनका साहस टूटता भी रहा. ड़ी बेटी माधुरी को याद करते हुए वह कहते हैं, “वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती. बीज लगाने से लेकर रोपाई हो, दवा का छिड़काव या कपास चुनना हो. सारा काम करती थी. उसने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि वो मेरी परेशानियों से परेशान है. हमेशा मेरी हिम्मत बँधाती. कहती थी कि पापा सब ठीक हो जाएगा. पर घर के हालात तो सब उसके सामने ही थे.”
इतने कहते-कहते भास्कर फफक फफककर रोने लगते हैं.
इस परिवार के पास अपनी एक एकड़ ज़मीन है. पर उससे गुज़ारा न हो पाने के कारण भास्कर हर साल ज़मीन किराए पर लेकर खेती किया करते थे.
“मैं बरसात और सर्दियों में 4-5 एकड़ ज़मीन मगते (किराए) पर लेकर खेती करता हूं. इस तरह साल में 10 से 12 एकड़ ज़मीन का किराया भरना पड़ता है. एक दो साल तो सब ठीक रहा लेकिन बीते साल जब बड़ी बेटी की शादी करनी थी, तभी