Tuesday, October 29, 2019

रूसी विदेश मंत्री ने मनायाक्रेमलिन से वॉक आउट

यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. उनके साथ काम करके बहुत आनंद आया. ये सही है कि वो बहुत ही अव्यवस्थित व्यक्ति थे. वो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे और उनके पास सरकारी कामकाज के लिए कोई वक्त नहीं रहता था.'
'हमने तय किया कि हम हर दिन उन्हें पटना के किसी डाक बंगले में ले जाएंगे, जहाँ वो शाँति से फ़ाइलों पर दस्तख़त कर सकें. हम उन्हें अक्सर बिहार मिलिट्री पुलिस के फुलवारी शरीफ़ वाले गेस्ट हाउज़ ले जाते थे जहाँ कोई उनसे मिलने नहीं पहुंच सकता था.'
'वो अपनी पत्नी को गाँव में ही रखते थे. एक बार मुझे उनके गाँव जाने का मौका मिला था. वहाँ पर हमारे बैठने के लिए एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पी कर जाएं. उन्होंने अपने हाथों से लकड़ी के चूल्हे में चाय बनाई. वो झोपड़ी में रहती थीं जहाँ आधुनिक जीवन की कोई भी चीज़ मौजूद नहीं थी.'
यशवंत सिन्हा आगे याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिंदी दाँ थे. उनके ज़माने में हर सरकारी काम हिंदी में किया जाता था, हाँलाकि उन्हें खुद अच्छी अंग्रेज़ी आती थी. केंद्रीय मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भेजा जाने वाला हर पत्र हिंदी में होता था, लेकिन साथ ही उसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था.'
इसने महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद यशवंत सिन्हा आ
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' एक दिन मैं और मेरी पत्नी हवाई जहाज़ से राँची से दिल्ली आ रहे थे. पटना में विमान में लालू प्रसाद यादव सवार हुए. मैंने उन्हें प्रणाम किया लेकिन उन्होंने प्रणाम का जवाब देना तो दूर मुझे पहचानने तक से इंकार कर दिया. दिल्ली में जब जहाज़ उतरा तो मेरे बगल में खड़े रहने के बावजूद उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की. मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि लालू ने आपकी बहुत उपेक्षा की है. लालूजी की इस हरकत को देखते हुए मैंने घर पहुंच कर तुरंत आडवाणीजी को फ़ोन कर कहा कि मैं आपसे तुरंत मिलना चाहता हूँ. कुछ दिनों बाद आडवाणी ने मुझे भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया और उन्होंने एक प्रेस कान्फ़्रेंस करके आलान किया कि मेरा बीजेपी में जाना पार्टी के लिए दीवाली गिफ़्ट है.'
ईएएस से इस्तीफ़ा दे कर जनसेवा करने का फ़ैसला किया. वो जयप्रकाश नारायण से बहुत प्रभावित थे, लेकिन जेपी चाहते थे कि वो तब तक आईएएस से इस्तीफ़ा न दें, जब तक उनकी आजीविका का प्रबंध न हो जाए.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'मुझे निराशा हुई जिस तरह दुमका में मेरे साथ मुख्यमंत्री ने व्यवहार किया था. मुझे लोगों ने मेरी बाकी ज़िम्मेदारियों के साथ ये कह कर कि एशियाई खेल आ रहे हैं दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का अध्यक्ष बना दिया. फिर वहाँ एक नेता आ गए. उन्होंने वहाँ की फ़िज़ा बिगाड़ दी.'
'उनसे हमारी पटी भी नहीं. नतीजा ये हुआ कि वहाँ हड़ताल हो गई और मेरे लिए वो तैनाती ज़बरदस्ती गले का बोझ बन गई. इससे भी मुझे बहुत निराशा हुई. आईएएस में अक्सर होता है कि कोई भी नेता आपके साथ दुरव्यवहार कर सकता है और आप 'पब्लिकली' उसके ख़िलाफ़ बोल नहीं सकते हैं.'
'ये सब सोच कर मैंने तय किया कि अब आईएएस छोड़ देते हैं. तब तक मेरे बच्चे 'सेटिल' हो गए थे, बेटी की शादी हो गई थी और मैं पेंशन पाने के योग्य भी हो गया था. मेरी तब 12 साल की नौकरी बची थी. मैंने आईएएस से इस्तीफ़ा दे दिया.'
आरंभिक झिझक के बाद उन्होंने जनता दल की सदस्यता गृहण कर ली. वो चंद्रशेखर के बहुत करीब हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह सत्ता में आए तो उन्होंने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के रूप में जगह दी, लेकिन उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'जब मैं राष्ट्रपति भवन में घुसा तो मुझे कैबिनेट सचिव टीएन सेशन का लिखा एक पत्र दिया गया. उसमें लिखा था कि राष्ट्रपति ने मेरी रा
1998 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो आरएसएस ने जसवंत सिंह के मंत्री बनने पर आपत्ति की, क्योंकि वो चुनाव हार गए थे. तब यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया. बाद में वो जसवंत सिंह की जगह भारत के विदेश मंत्री बने.
उसी दौरान उन्हें वाजपेई प्रतिनिधिमंडल के साथ रूस जाने का मौका मिला. यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'हम लोग क्रेमलिन जा रहे थे. वहाँ दो स्तरों पर बातचीत होनी थी. एक तो वाजपेई और पुतिन के बीच आमने सामने की बातचीत होने वाली थी, जिसमें मैं और ब्रजेश मिश्रा दोनों रहने वाले थे.
ब्रजेश मिश्रा वाजपेईजी की गाड़ी में उनके साथ ही बैठ गए क्योंकि रास्ते में उन्हें उनसे बात करनी थी. दूसरी गाड़ी में मैं और रूस में भारत के राजदूत रघुनाथ बैठे. वाजपेईजी की गाड़ी तो सीधे चली गई. हम लोगों को किसी दूसरे गेट पर लाया गया. वहाँ पर उन्होंने हमें कार से उतार कर हमारी सुरक्षा जाँच की. फिर उन्होंने हमें एक जगह ले जा कर बैठा दिया. मैंने कहा कि हमें बातचीत में शामिल होना है, लेकिन इसका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा.'
ज्य मंत्री के तौर पर नियुक्ति की है. पढ़ते ही मेरा दिल बैठ गया.'
'मैंने 10 सेकेंड के अंदर फ़ैसला किया कि मैं इस पद को स्वीकार नहीं करूँगा. मैं तुरंत पलटा. अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और उससे दृढ़ आवाज़ में कहा, 'तुरंत वापस चलो.'
'पार्टी में मेरी वरिष्ठता को देखते हुए और चुनाव प्रचार में मैंने जिस तरह का काम किया था, वी पी सिंह ने मेरे साथ न्याय नहीं किया था. सबसे बड़ी बात ये थी कि मुझे जूनियर मंत्री का पद दे कर उन्होंने मेरे नेता चंद्रशेखर का भी अपमान किया था.'
इसके बाद जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें वित्त मंत्री बनाया. लेकिन वो सरकार बहुत अधिक समय तक चली नहीं. सरकार गिरने के कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
य़शवंत सिन्हा बताते हैं, 'चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी समाप्ति की तरफ़ थी. उस समय मेरे पास दो विकल्प थे. एक था कांग्रेस और दूसरी भारतीय जनता पार्टी. नरसिम्हा राव बहुत चाहते थे कि मैं कांग्रेस में आऊँ. उनसे कई बार मुलाकात भी हुई. लेकिन मुझे कांग्रेस पार्टी में जाना अच्छा नहीं लगा.
एक 'कॉमन' मित्र ने मेरी मुलाकात आडवाणी जी से करवाई लेकिन पार्टी में जाने की कोई बात उनसे नहीं हुई. उसी ज़माने में जनता दल के सभी घटकों को एक करने की मुहिम भी चल रही थी.

Wednesday, October 2, 2019

دونالد ترامب "يقترح إطلاق النار على سيقان المهاجرين"

اقترح الرئيس الأمريكي دونالد ترامب إطلاق النار على سيقان المهاجرين الذين يحاولون دخول الولايات المتحدة، وفقا لكتاب صدر حديثا.
وورد في الكتاب، الذي أعده صحفيان من صحيفة نيويورك تايمز، أن ترامب اقترح "اتخاذ إجراءات قاسية لردع المهاجرين"، تتضمن بناء جدران يمر فيه تيار كهربائي وخنادق تتجول فيها الأفاعي والتماسيح.
ولم يصدر أي تعليق من البيت الأبيض على الكتاب. يذكر أن بناء جدار عازل على الحدود مع المكسيك كان أحد الإجراءات التي تعهد بها ترامب لمواجهة الهجرة.
وقد خصصت وزارة الدفاع مبلغ 3.6 مليار دولار للجدار الذي بدأت أعمال بنائه.

ويحمل الكتاب عنوان "حروب الحدود: نظرة على سياسة ترامب الهجومية على الهجرة". ويعتمد الكتاب الذي ألفه مايكل شير وجولي ديفيز على مقابلات مع أكثر من عشرة مسؤولين لم ترد أسماؤهم.
ويعرض الكتاب الأحداث التي وقعت في أسبوع واحد من شهر مارس/آذار من العام الجاري (2019) حين أفادت تقارير أن ترامب حاول إيقاف الهجرة من الجنوب لكن مساعديه أخبروه أن اقتراحه غير قانوني.
وقال أحد الخبراء إن "ترامب اقترح في محادثة خاصة مع مساعديه إطلاق النار على سيقان المهاجرين، لكنهم أخبروه أن ذلك غير قانوني".
وكان ترامب قد دعا في أحد خطاباته إلى إطلاق النار على المهاجرين الذين يلقون الحجارة.
ويفيد الكتاب أن ترامب اقترح بعض الإجراءات المتطرفة الأخرى.
ورد في إحدى فقرات الكتاب أن ترامب اقترح في محادثات خاصة "تعزيز الحدود بحفر خنادق وملئها بالماء وإطلاق الثعابين والتماسيح فيها، وطلب من مساعديه السؤال عن تكاليف ذلك . وكان يريد تزويد الجدار بمسامير وتيار كهربائي".
ويصف النص المقتطع من الكتاب كيف أصدر ترامب تعليماته لمساعديه لتعزيز إغلاق الحدود بين الولايات المتحدة والمكسيك بحلول ظهر اليوم التالي، مما أدى إلى حالة من الهلع وسط المساعدين الذين حاولوا إرضاءه.
وتفيد المعلومات أن المساعدين حاولوا تغيير فكرة ترامب عن إغلاق الحدود، لكنه مارس ضغوطا في وقت لاحق على بعض المساعدين الذين كان يعتقد أنهم يقفون في طريق إجراءاته، ومنهم وزيرة الأمن الداخلي كيرستين نيلسن.
جعل ترامب الحملة على الهجرة غير القانونية إحدى أهم أولوياته منذ بدء حملته الانتخابية عام 2016.
وأدى موقف الرئيس الجمهوري إلى مواجهات مع الديمقراطيين في الكونغرس، خاصة فيما يتعلق بظروف مراكز احتجاز المهاجرين وتمويل الجدار.
وأعلن ترامب حالة الطوارئ على الحدود مع المكسيك في شهر فبراير/شباط من أجل الحصول على تمويل.
وفي شهر يونيو/ حزيران وقع اتفاقية مع المكسيك مدتها 90 يوما تهدف إلى تقليل أعداد المهاجرين المتدفقين إلى الولايات المتحدة، تتضمن التعاون الثنائي الوثيق ونشر المكسيك الآلاف من افراد الحرس الوطني في جميع أنحاء البلاد.
وقالت المكسيك الشهر الماضي إنها نجحت في تقليل عدد المهاجرين الذين يقطعون الحدود إلى الولايات المتحدة دون وثائق بنسبة 56 في المئة منذ مايو/أيار الماضي.
لكن، وبالرغم من أن الأرقام تفيد بأن أعداد الداخلين إلى الولايات المتحدة قد تضاءلت منذ عام 2000، إلا أنها بدأت بالارتفاع مجددا منذ تولي ترامب منصب الرئاسة.
وقد شهد العام الجاري احتجار أكثر من 800 ألف شخص على الحدود الجنوبية ، وهو ضعف العدد الذي سجل في عام 2018 بأكمله.
ولجأ معظم الذين قطعوا الحدود إلى الولايات المتحدة هربا من الفقر والعنف.

Friday, September 6, 2019

الأم تريزا: "عدوة الحركة النسائية" ورائدة العمل الخيري في العالم

يحتفل العالم اليوم بـ " اليوم الدولي للعمل الخيري" الذي يصادف الخامس من سبتمبر/أيلول من كل عام، وجاء الاحتفال هذا العام تزامناً مع "عام التسامح" الذي شهد إطلاق العديد من المبادرات الإنسانية والخيرية.
وكانت الجمعية العامة للأمم المتحدة قد اعتمدت في عام 2012 يوم 5 سبتمبر/ أيلول يوما عالميا للأعمال الخيرية ليتزامن مع إحياء الذكرى السنوية لوفاة الأم تيريز، التي رحلت عام 1997، والتي كانت قد كرست حياتها وأعمالها الخيرية لصالح بعض أفقر أعضاء الأسرة البشرية وأضعفهم.
عندما كانت الأم تريزا على قيد الحياة أطلق عليها اسم "القديسة الحية"، وبعد 19 عاما من وفاتها حملت رسميا لقب قديسة.
فقد اعترف البابا فرانسيس بابا الفاتيكان بالمعجزة الثانية المنسوبة لها وهي شفاء برازيلي كان مصاباً بأورام في الدماغ عام 2008.
وكانت هذه السيدة صغيرة الحجم قد لفتت أنظار العالم إليها بسبب اهتمامها بالفقراء وخاصة في مدينة كالكوتا الهندية حيث أسست أول ملجأ استقبل آلاف الفقراء.
وقد تحول هذا الملجأ لاحقا إلى مؤسسة ضمت 3 آلاف راهبة و400 راهب واستقبلت فقراء ومرضى من مختلف أنحاء الهند.
وفي عام 1979 قبلت جائزة نوبل ولكنها طلبت تحويل الأموال المخصصة لعشاء تكريمها إلى فقراء مدينة كالكوتا.
وبعد وفاتها بخمسة أعوام قبل البابا يوحنا بولص الثاني بابا الفاتيكان الراحل المعجزة الأولى المنسوبة لها وهي شفاء امرأة من ورم في البطن.
ولدت الأم تريزا باسم أجنيس غونكسا بوغاكسيو عام 1910 في سكوبيه، عاصمة جمهورية مقدونيا الحالية والتي كانت حينئذ جزءاً من الإمبراطورية العثمانية لأسرة ألبانية كاثوليكية.
ومنذ أن كانت في الثانية عشر من عمرها قررت العمل في التبشير في الهند، وفي سن 19 عاما انضمت إلى معهد ديني ايرلندي حيث درست الإنجليزية، وفي عام 1929 توجهت إلى الهند.
بعد أن حملت أجنيس اسم تريزا، نسبة للقديسة الفرنسية تريزا دي ليزيو التي عاشت في القرن التاسع عشر، عملت في التدريس في دارجيلين، وهي مدينة في سفوح جبال الهيمالايا.
وفي عام 1946 سمعت نداءً داخليا يدعوها لمساعدة الفقراء الذين تعيش بينهم.
وبعد 10 سنوات من مساعدة الفقراء في أزقة كالكوتا التي كان يعيش بها 100 ألف مشرد فتحت مشفى في معبد هندوسي في كاليغات ثم ملجأ لليتامى وآخر لمرضى الجذام.
انتشرت أعمالها في الهند وذاعت شهرتها في العالم. وفي عام 1970 قدم الصحفي مالكولم ماغريدي فيلما سلط فيه الضوء عليها في الغرب.
وقد ألهمت الأم تريزا ماغريدي، وكان من اللا أدريين، للتحول إلى الكاثوليكية.
وكانت الأم تريزا معارضة بشدة لمنع الحمل وللإجهاض. وقالت في مؤتمر بأوكسفورد عام 1988 إنها لن تسمح أبدا بانتقال طفل تحت رعايتها إلى امرأة تستخدم وسائل منع الحمل أو قامت بإجهاض لأنها لا تثق في هكذا امرأة "فمثلها لا تستطيع أن تحب"
وقد وضعها ذلك في مواجهة مع الحركة النسوية. وقد وصفتها غيرمين غرير بأنها "إمبريالية متشددة".
وقال الكاتب كريستوفر هيتشينز إنها كانت تحب الفقر وتعتبره هدية من الله وقضت حياتها تعارض الوسيلة الوحيدة لمكافحة الفقر ألا وهو تمكين المرأة وتحريرها من قيود المجتمع ومن دورها كمخلوق هدفه التكاثر فقط.
كما ندد هيتشينز أيضا بعلاقتها بحكام طغاة مثل دوفالييه في هاييتي وأنور خوجه في ألبانيا، وعلاقتها بأسوأ الأغنياء في العالم مثل شارلز كيتنغ رئيس شركة لينكولن سيفينغز الذي يعتبر أحد أكبر المحتالين في مجال الاستثمارات المالية عبر التاريخ، وكانت الأم تيريزا قد بعثت رسالة الى المحكمة التي كانت تنظر في قضيته طلبت فيها الرأفة به لتبرعه للمؤسسات الخيرية .
وكانت وجهة نظر الأم تريزا أنه لو قدم أحد إحسانا للفقراء فلابد من قبوله بصرف النظر عن شخصية مصدر المال.
كما طرحت علاقاتها بالمشاهير، مثل الليدي ديانا، والصور التي ظهرت فيها معهم سؤالا حول مدى إيمانها بالتواضع.
وفي عام 2015 ، قال الزعيم الهندوسي هو موهان باغوات، وهو رئيس منظمة الهندوس الوطنية، إن جمعية الأم تريزا الخيرية كان هدفها الوحيد تحويل الفقراء إلى المسيحية.
وكان موقفها المحافظ من الإجهاض ووسائل منع الحمل قد لاقى ترحيبا من البابا يوحنا بولص الثاني المحافظ والذي استخدمها كمتحدثة باسمه في القضايا البابوية.
ورغم الانتقادات فقد كانت الأم تريزا، التي لم تمتلك سوى دلو وثوبين من الساري، رمزا للحب والعطاء لأولئك الذين افتقدوا الحب والعطاء، وكما قال ماغريدي "كانت شيئا جميلا من الرب".
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Friday, May 10, 2019

في الفاينانشيال تايمز: محمد بن سلمان وصعود مد وطني متطرف في السعودية

تنوعت اهتمامات الصحف البريطانية الصادرة صباح الجمعة بملفات المنطقة العربية واهتمامات القارئ العربي في نسخها الورقية والرقمية، وعلى رأسها الملف الإيراني وسياسات ترامب واحتمالات الحرب في المنطقة، وصعود "نزعة وطنية" تسببت هجمات في وسائل التواصل الاجتماعي في المملكة العربية السعودية، علاوة على مخاطر "الكارثة الإنسانية التي تهدد بجعل مليون إنسان في غزة يعانون من نقص الغذاء" وغيرها من الملفات.
نشرت الفاينانشيال تايمز تقريرا لاثنين من مراسليها بعنوان "صعود النزعة الوطنية السعودية في رحلة البحث عن الهوية"، ووضعت له عنوانا ثانويا يقول إن صعود ولي العهد السعودي محمد بن سلمان ألهم مدا وطنيا قاد إلى هجمات على آخرين في وسائل التواصل الاجتماعي.
ويقول التقرير إنه في الوقت الذي تم فيه بث الحلقة الأخيرة من المسلسل الشهير "صراع العروش" بثت شركة إعلامية مقطعا صغيرا مصورا يظهر شخصا بجلباب أبيض يجلس على العرش الحديدي الشهير الذي يثور حوله الصراع في المسلسل.
ويضيف أن الهدف من نشر المقطع كان بهدف الترويج للشركة في المملكة لكن ما حدث بعد ذلك كان مختلفا، إذ سارع بعض المواطنين إلى مواقع التواصل الاجتماعي لانتقاد المقطع واعتبروه هجوما على العائلة السعودية المالكة، ودعوا إلى محاسبة المسؤول عن نشره بل وطالب البعض بسحب الجنسية عن المتورطين في إعداده ونشره.
ويوضح التقرير أن "الهجوم على المقطع الذي يبلغ طوله 10 ثوان ونُشر أولا على تطبيق سناب شات يعتبر أحدث الأمثلة على تزايد نزعة التطرف الوطني في المملكة خلال السنوات الثلاث الماضية منذ سيطرة ولي العهد محمد بن سلمان على السلطة في البلاد".
ويشير التقرير إلى أنه بالنسبة لمؤيدي ولي العهد السعودي "يُعد هذا الاتجاه حماسة مطلوبة وتعبيرا عن الثقة في القيادة الجديدة للبلاد، لكنه بالنسبة لآخرين يمثل إجراء تقسيميا للمجتمع ومثيرا للمخاوف من العقلية العدائية التي تعتمد مبدأ "من ليس معنا، هو بالتأكيد ضدنا" التي تعززت في ظل ولي العهد البالغ من العمر 33 عاما".
وينقل التقرير عن أكاديمي سعودي رفض الإعلان عن اسمه كما يفعل كثيرون، بحسب التقرير، قوله "إنها سياسة إقصائية بشكل شديد حتى تجاه سعوديين آخرين ويمكن أن تتحول إلى نزعة خطرة جدا على المدى البعيد".
ويقول التقرير "في هذه البيئة يمكن لأي حركة معارضة بسيطة أن تودي بالمرء إلى غياهب السجن، بل وقد يكلف مجرد عدم إظهار الولاء لبن سلمان بشكل كاف على مواقع التواصل الاجتماعي المرء سمعته ووظيفته وحتى حريته".
ويخلص التقرير إلى أن المملكة تبحث عن هويتها منذ تأسست عام 1932 وظلت لعدة عقود تعلم التلاميذ في المدارس أن الانتماء للإسلام أولا ثم العروبة ثانيا والسعودية ثالثا، لكن بعد هجمات سبتمبر/أيلول عام 2001 في الولايات المتحدة والهجمات الإرهابية في المملكة توجهت الحكومة السعودية إلى تعزيز فكرة الهوية لمكافحة التطرف.
ويضيف التقرير أن النشطاء يعزون تصاعد المد الوطني هذا إلى مستشاري ولي العهد الذين استخدموا وسائل التواصل الاجتماعي لدعم موقفه وخططه الاقتصادية وسياساته الخارجية بدءاً من قرار محاصرة قطر وحتى الأزمة مع كندا العام الماضي.
كما يلمح التقرير إلى أن سعود القحطاني مستشار ولي العهد الذي استبعد في إطار دوره المزعوم في قضية مقتل المعارض السعودي جمال خاشقجي كان يعد المحرك للعديد من هذه الحملات على مواقع التواصل الاجتماعي، بيد أن ناشطين سعوديين يخشون من أنه ما زال فاعلا من وراء الستار.
ونشرت الغارديان مقالا للكاتب المختص بالشؤون ا لدولية سايمون تيسدال بعنوان "سياسات ترامب الحمقاء تجعل الحرب مع إيران أقرب".
يقول تيسدال إن "القادة الإيرانيين يواجهون خيارات صعبة أمام سياسات الولايات المتحدة العدائية والمستمرة والتي لاتهدف إلا إلى أمر واحد فقط هو تغيير النظام".
ويعتبر تيسدال أنه من غير الواضح ماذا يمكن أن تفعل إيران لتقلل من التصرفات المعادية من الجانب الأمريكي وحلفائه الإقليميين و تهديدهم بالتصعيد العسكري واندلاع مواجهة شاملة.

Friday, April 19, 2019

قتلوها حرقا بعد أن أبلغت عن تحرش مدير المدرسة بها

ووفقا لبلاغ نصرت، فإن طالبة من زميلاتها في المدرسة اصطحبتها لسطح المبنى، قائلة إن واحدة من صديقاتها تتعرض للضرب. وعند وصول نصرت للسطح، أحاط بها أربعة أو خمسة يرتدون نقابا للضغط عليها لسحب البلاغ ضد مدير المدرسة. وعندما رفضت، أشعلوا في جسدها النيران.
وقال باناج كومار ماجومدار، مدير مكتب التحقيقات التابع للشرطة، إن القتلة أرادوا أن "يبدو الأمر كما لو كان انتحارا". وأخفقت خطتهم بعد انقاذ نصرت بعد هروب من أشعلوا فيها النيران. وتمكنت من الإبلاغ بشهادتها للشرطة قبل وفاتها.
وقال ماجودار لخدمة بي بي سي باللغة البنغالية "كان أحد القتلة يمسك برأسها، مميلا إياه للأسفل، ولهذا لم يحترق رأسها".
ولكن عند نقلها إلى مستشفي محلي، قال الأطباء إن الحروق تغطي 80 في المئة من جسمها، وتم نقلها إلى مستشفى كلية الطب بداكا".
وفي سيارة الإسعاف، سجلت نصرت شهادتها وبلاغها على هاتف شقيقها المحمول، لأنها كانت تخشى ألا تنجو لتبلغ عما حدث لها.
وقالت نصرت في شهادتها "المدرس تحرش بي وسأتصدى لهذه الجريمة لآخر نفس".
وقالت نصرت في شهادتها إن بعض مهاجميها من الطالبات في مدرستها.
وهيمنت أنباء الحالة الصحية لنصرت على التغطية الإعلامية لبنغلاديش. وفي العاشر من إبريل/نيسان، توفيت نصرت، وخرج الآلاف لحضور جنازتها في فيني.
واعتقلت الشرطة إثر ذلك 15 شخصا، يعتقد أن سبعة من بينهم على صلة بقتل نصرت. ومن بين المحتجزين الطالبان اللذان نظما الاحتجاجات دعما لمدير المدرسة. وما زال مدير المدرسة رهن الاحتجاز. وتم إبعاد الضابط الذي سجل بلاغ نصرت بهاتفه المحمول ونقل إلى قسم آخر.
والتقت الشيخة حسينة، رئيسة وزراء بنغلاديش، بأسرة نصرت وتعهدت بمثول جميع المسؤولين عن مقتلها أمام العدالة.
وقالت الشيخة حسينة "لن يفر أي من الجناة من طائلة العدالة".
وأشعل مقتل نصرت احتجاجات في البلاد، واستخدم الالاف شبكات التواصل الاجتماعي للإعراب عن غضبهم إزاء ما حدث لها وعن المعاملة التي يلقاها ضحايا الاعتداء الجنسي في بنغلاديش.
وقالت أنوار شيخ على صفحة خدمة بي بي سي باللغة البنغالية على فيسبوك "لا تحتج الكثيرات خشية مثل هذه الحوادث. لا يوقف البرقع أو حتى الأثواب المصنوعة من الحديد الفتيات من المغتصبين".
وقالت لوبا حسين على صفحتها على فيسبوك "أردت أن يكون لي ابنة طوال حياتي. إنجاب فتاة في هذا البلد يعني حياة من الخوف والقلق".
ووفقا لجماعة "بنغلاديش ماهيبا باريشاد" لحقوق المرأة، وقعت 940 حالة اغتصاب في بنغلاديش عام 2018، ولكن باحثين يقولون إن من المرجح أن يكون العدد أكثر من ذلك بكثير.
وقالت سلمى علي، المحامية المتخصصة في حقوق الإنسان والمديرة السابقة لرابطة المحاميات في بنغلاديش "عندما تحاول امرأة الحصول على العدالة إثر تعرضها للاعتداء الجنسي، عليها أن تواجه الكثير من التحرش والمضايقات مجددا. تبقى القضية أعواما وتواجه العار في المجتمع، وعزوف الشرطة عن التحقيق في الأمر".
وأضافت "يؤدي ذلك إلى تخلي الضحية عن السعي للعدالة. في نهاية المطاف لا تتم محاسبة الجناة فيعاودون فعل ما فعلوه. ولا يخشى الآخرون من اقتراف ما اقترفه الجناة، لأنهم يرون أن الجناة يفلتون من العقاب".
والان يتساءل الناس: لم تحظ قضية نصرت بالاهتمام إلا بعد تعرضها للحرق والهجوم؟ وهل ستغير قضيتها نظرة الناس للتحرش الجنسي والاعتداء الجنسي؟
في عام 2009 أصدرت المحكمة العليا في بنغلاديش قرارا بإقامة وحدات خاصة في كل المؤسسات التعليمية يمكن للطالبات الإبلاغ عن تعرضهن للاعتداء الجنسي، ولكن القليل من المدارس امتثلت للقرار. ويطالب النشطاء الآن بتحويل قرار المحكمة العليا لقانون لحماية الطالبات.
وقالت كابيري غاين، الأستاذة في جامعة داكا "جاء هذا الحادث بمثابة صدمة لنا، ولكن كما رأينا في الماضي، تنسى هذه الحوادث مع مرور الوقت. لا أعتقد أن الأمر سيعقبه تغيير كبير. يجب علينا أن نفعل ما في وسعنا لتطبيق العدالة".
وأضافت "يجب أن يأتي التغيير نفسيا وعن طريق تطبيق أحكام القانون. يجب زيادة الوعي عن الاعتداء والتحرش الجنسيين منذ الطفولة في المدرسة".
وأضافت "يجب عليهم أن يتعلموا الصواب والخطأ فيما يتعلق بالتحرش الجنسي".

Thursday, January 31, 2019

पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

उन्होंने कहा," पिछली बार मेघालय विधानसभा में बीजेपी को जो दो उम्मीवार थे वे इतनी मज़बूत थे कि किसी भी पार्टी से खड़े होते तो चुनाव जीत जाते.दरअसल मेघालय में लोग पार्टी को नहीं व्यक्ति को वोट देते हैं."
हालांकि बीजेपी नेता इस तरह के विरोध के बाद भी ये स्वीकार करने को तैयार नहीं कि आने वाले समय में पार्टी को कोई नुकसान उठाना पड़ेगा.
असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता कहते है, "अगर कोई ये कह रहा है कि भारतीय जनता पार्टी विकास के मुद्दे से हट गई है तो ये पूरी तरह गलत है. हम अगर असम की बात करें तो यहां चार नए पुलों का उद्घाटन हुआ है और चार नए पुलों का निर्माण होगा. वहीं पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी की बात है तो जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी तो केवल 12 फ्लाइट आया करती थी लेकिन आज 256 फ्लाइट यहां आती है. हमने सड़क और रेल कनेक्टिविटी में भी काफी काम किया है. आज त्रिपुरा और मिजोरम जैसे राज्य रेल से जुड़ गए है."
जब बीजेपी की सरकार ने इस क्षेत्र के लिए इतना कुछ किया है तो फिर विरोध क्यों हो रहा है. सहयोगी पार्टियां साथ क्यों छोड़ रही है? इस सवाल का जवाब देते हुए भाजपा नेता कहते है," अगर किसी एक मुद्दे पर सहयोगी दल के कुछ लोग हमसे सहमत नहीं है तो इसका मतलब ये नहीं है कि वे नेडा का हिस्सा नहीं है. इससे नेडा की एकता पर कोई सवाल नहीं है."
भाजपा नेता साथ ही स्वीकार करते हैं कि अगर उनकी पार्टी एक मुद्दे (नागरिकता संशोधन बिल) को छोड़ दे तो नेडा के सभी साथी उनके साथ फिर आ जाएंगे.
वो कहते है," कुछ लोग इस मुद्दे की गलत व्याख्या करने में लगे हुए है. हमने 2014 तक की समय सीमा रखी है, इसके बाद आने वाले किसी भी व्यक्ति को नागरिकता नहीं दी जाएगी. इस बिल में पहले कई संशोधन हुए है और हमारी सरकार यहां के लोगों की सुरक्षा के लिए ही ये संशोधन कर रही है."
इस पूरे मुद्दे पर नजर रख रहे गुवाहाटी हाई कोर्ट के सीनियर वकील कमल नयन चौधरी ने कहा,"असम के इतिहास को देखें तो यहाँ बांग्लादेश से जो घुसपैठ की समस्या है वो 1918 से शुरू हुई थी.उस समय एक देश था, तो पूर्वी बंगाल के जो लोग असम आकर बस थे वो अवैध नहीं थे."
"1951 में जो राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाई गई थी उस समय ही असम में पूर्वी बंगाल के 30 फ़ीसदी लोग थे. वो तो यहां के लोगों ने मान लिया था. उसके बाद भी जब घुसपैठ जारी रही तो 1979 में असम आंदोलन हुआ. लंबे चले आंदोलन के बाद असम समझौता हुआ. इस समझौते में 1971 तक आए सभी लोगों को स्वीकार लिया गया."
"अभी बीजेपी जो बिल लाई है उसमें 2014 तक आए हिंदू लोगों को यहाँ नागरिकता देने की बात कह रहें हैं. अगर इतनी भारी संख्या में बंगाली लोग आएंगे तो असमिया लोगों का तो अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. इसलिए यहां लोग कड़ा विरोध कर रहें है."
नागरिकता बिल को लेकर असम प्रदेश कांग्रेस के लोग भी लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन पार्टी की असली भूमिका राज्यसभा में देखने को मिलेगी. अगर कांग्रेस सांसद राज्यसभा में इस बिल का विरोध करेंगे तो सरकार इस बिल को नहीं ला पाएगी.
ऐसे ही एक सवाल का जवाब देते हुए असम प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अपूर्व भट्टाचार्य कहते है,"जिस कदर भाजपा के ग्यारह सहयोगी दलों ने बैठक कर इस बिल का विरोध करने का निर्णय लिया है उससे साफ हो गया है कि इन लोगों ने भाजपा को बिदाई देने का मन बना लिया है.बीजेपी जिस नेडा की बात करती है उसके लोग ही उनके खिलाफ हो गए है."

Monday, January 14, 2019

والد الشاب الألماني الذي رُحل من مصر: ضرب في مقتل وتم تدمير مستقبله دون دليل

قال والد أحد الشابين الألمانيين، اللذين رحلتهما السلطات المصرية أخيرا، إن ابنه يشعر بالصدمة وإنه "ضرب في مقتل وتم تدمير مستقبله" بإتهامه بأنه انضم لتنظيم ما يعرف بالدولة الإسلامية قبل ترحيله وبعد إيقافه واحتجازه والتحقيق معه.
ورحلت السلطات المصرية محمود عمرو عبدالعزيز فجر الجمعة وقامت بترحيل الشاب الاخر ويدعى عيسى الصباغ بعدما قالت إنهما حاولا الانضمام لتنظيم مسلح ينشط في سيناء.
وأضاف الوالد في إتصا
وأشار إلى أن السلطات الألمانية احتجزت جواز سفر ابنه في إطار تحقيقات تجريها معه منذ عودته من القاهرة لكن الابن مع الأسرة في الوقت الحالي لكنه شكا من أن" وسائل إعلام ألمانية باتت تطرح أسئلة بشأن إنتماء محمود من عدمه لتنظيمات مسلحة مما أثر بشدة على حالته النفسيه وصورته وإحتمال عودته للسعودية لاستناف منحته الدراسية."
وكان مصدر أمني مصر قال في تصريح صحفي في ذلك الحين "توافرت لدينا معلومات بأن محمود عزت، وهو طالب بالجامعة الإسلامية بالسعودية، يحاول الانضمام للعناصر الإرهابية الموجودة في سيناء".
لكن الشاب قال بعد عودته : "تم إجباري على تسجيل اعترافات غير صحيحة".
لكن وعقب وصوله الآراضي الألمانية نفى الشاب المرحل محمود عبد العزيز، 24 عاما، في شريط فيديو نشره على حسابه على موقع التواصل الإجتماعي فيسبوك الانتماء إلى أي تنظيم مسلح.
وأضاف أن جهاز الأمن المصري أجبره على تصوير فيديو "وأنا أرفض وأنفي جميع ما قلته في هذا الفيديو".
وقال "أنا طالب وأتمنى استكمال المنحة الدراسية التي حصلت عليها بصعوبة وبعد انتظار طويل."
وقال عبد العزيز إنه سافر إلى مصر في السابع والعشرين من ديسمبر/كانون الأول الماضي لزيارة جده المريض وجدته مضيفا " أنفي انتمائي لأي حزب من الأحزاب ولأي فرقة من الفرق وعلى وجه الخصوص أنا أبعد الناس عن الدواعش".
ورحلت السلطات المصرية صباح الاثنين شابا ألمانيا ثانيا، من أصل مصري أيضا، يبلغ من العمر ثمانية عشرة على خلفية الاتهام ذاته.
وظهر الشاب ويدعى عيسى إبراهيم الصباغ في صورة فوتوغرافية عند نقطة تفتيش داخل المطار قبل ترحيله.
وقالت مصادر أمنية سلفا إنه تم ضبط الصباغ بمطار الأقصر جنوب البلاد الشهر الماضي وبحوزته خرائط لمحافظة شمال سيناء.
وأضاف المصدر أنه تقرر ترحيله لبلد جنسيته، بالتنسيق مع السفارة الألمانية، وبعد تنازله عن جنسيته المصرية، نظرا لعدم ارتكابه إحدى الجرائم المنصوص عليها قانونا.
وبحسب مصادر أمنية مصرية، كان الصباغ وصل البلاد قادما من ألمانيا عبر مطار الأقصر الجوي، "وتبين -اقتناعه- بمفاهيم تنظيم الدولة الإسلامية الإرهابي في ألمانيا وارتباطه إلكترونيا ببعض عناصره هناك، وقدومه إلى مصر بغرض الانضمام إلى صفوف العناصر الإرهابية في شمال سيناء".
وأشارت المصادر إلى أنه تم اعداد إجراءات ترحيله إلى بلد الجنسية، بعدما اتضح أن والده وافق في ٢٠٠٧ على اكتسابه الجنسية الألمانية مع عدم الاحتفاظ بالجنسية المصرية، وسريان ذلك عليه بالتبعية لوالده.

 ويقول العميد خالد عكاشة الخبير الأمني وعضو المجلس الأعلى لمكافحة الإرهاب إن قرار السلطات المصرية بإيقاف الشابين والتحقيق معهما وترحيلهما "حق سيادي بإمتياز لكل الدول كما هو حق للدولة المصرية".

وأضاف عكاشة لبي بي سي أنه " لابد وأنه لدى الاجهزة المصرية معلومات عن نشاطاتهما في أماكن ليست على الاراضي المصرية وأنهما على اتصال بتنظيمات إرهابية خارج مصر ولهذا قررت نزع الجنسية وقامت بترحيلها لإنهما لم يرتكبا جرما على الأراضي المصرية وتفاديا لأي تواصل محتمل لهما مع تنظيمات إرهابية محلية. "
ل هاتفي مع بي بي سي من القاهرة قبل سفره لألمانيا أنه سيلجأ للقضاء المصري والألماني على السواء لتبرئة إبنه من تلك الاتهامات وكذلك "لاستعادة جنسيته المصرية التي انتزعت عنه كشرط لترحيله".
وقال "الجنسية ليست منحة من أحد كي يأخذها وقتما يريد، وانتزاعها لابد وأن يخضع لإجراءات "، نافيا بشدة ما وجهته السلطات المصرية لابنه من اتهامات بالإنتماء لتنظيم الدولة.
وأضاف "ابني ليس له أي نشاط سياسي أو أي نشاط على فيسبوك أو شئ من هذا القبيل أو اي ارتباطات بأي تنظيمات نسبت إليه.. كل القصة إنه يدرس في السعودية وذقنه كانت طويلة نسبيا."