यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत ही विलक्षण प्रतिभा के
धनी थे. उनके साथ काम करके बहुत आनंद आया. ये सही है कि वो बहुत ही
अव्यवस्थित व्यक्ति थे. वो हमेशा लोगों से घिरे रहते थे और उनके पास सरकारी
कामकाज के लिए कोई वक्त नहीं रहता था.'
'हमने तय किया कि हम हर दिन उन्हें पटना के किसी डाक बंगले में ले जाएंगे, जहाँ वो शाँति से फ़ाइलों पर दस्तख़त कर सकें. हम उन्हें अक्सर बिहार मिलिट्री पुलिस के फुलवारी शरीफ़ वाले गेस्ट हाउज़ ले जाते थे जहाँ कोई उनसे मिलने नहीं पहुंच सकता था.'
'वो अपनी पत्नी को गाँव में ही रखते थे. एक बार मुझे उनके गाँव जाने का मौका मिला था. वहाँ पर हमारे बैठने के लिए एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पी कर जाएं. उन्होंने अपने हाथों से लकड़ी के चूल्हे में चाय बनाई. वो झोपड़ी में रहती थीं जहाँ आधुनिक जीवन की कोई भी चीज़ मौजूद नहीं थी.'
यशवंत सिन्हा आगे याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिंदी दाँ थे. उनके ज़माने में हर सरकारी काम हिंदी में किया जाता था, हाँलाकि उन्हें खुद अच्छी अंग्रेज़ी आती थी. केंद्रीय मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भेजा जाने वाला हर पत्र हिंदी में होता था, लेकिन साथ ही उसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था.'
इसने महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद यशवंत सिन्हा आ
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' एक दिन मैं और मेरी पत्नी हवाई जहाज़ से राँची से दिल्ली आ रहे थे. पटना में विमान में लालू प्रसाद यादव सवार हुए. मैंने उन्हें प्रणाम किया लेकिन उन्होंने प्रणाम का जवाब देना तो दूर मुझे पहचानने तक से इंकार कर दिया. दिल्ली में जब जहाज़ उतरा तो मेरे बगल में खड़े रहने के बावजूद उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की. मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि लालू ने आपकी बहुत उपेक्षा की है. लालूजी की इस हरकत को देखते हुए मैंने घर पहुंच कर तुरंत आडवाणीजी को फ़ोन कर कहा कि मैं आपसे तुरंत मिलना चाहता हूँ. कुछ दिनों बाद आडवाणी ने मुझे भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया और उन्होंने एक प्रेस कान्फ़्रेंस करके आलान किया कि मेरा बीजेपी में जाना पार्टी के लिए दीवाली गिफ़्ट है.'
ईएएस से इस्तीफ़ा दे कर जनसेवा करने का फ़ैसला किया. वो जयप्रकाश नारायण से बहुत प्रभावित थे, लेकिन जेपी चाहते थे कि वो तब तक आईएएस से इस्तीफ़ा न दें, जब तक उनकी आजीविका का प्रबंध न हो जाए.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'मुझे निराशा हुई जिस तरह दुमका में मेरे साथ मुख्यमंत्री ने व्यवहार किया था. मुझे लोगों ने मेरी बाकी ज़िम्मेदारियों के साथ ये कह कर कि एशियाई खेल आ रहे हैं दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का अध्यक्ष बना दिया. फिर वहाँ एक नेता आ गए. उन्होंने वहाँ की फ़िज़ा बिगाड़ दी.'
'उनसे हमारी पटी भी नहीं. नतीजा ये हुआ कि वहाँ हड़ताल हो गई और मेरे लिए वो तैनाती ज़बरदस्ती गले का बोझ बन गई. इससे भी मुझे बहुत निराशा हुई. आईएएस में अक्सर होता है कि कोई भी नेता आपके साथ दुरव्यवहार कर सकता है और आप 'पब्लिकली' उसके ख़िलाफ़ बोल नहीं सकते हैं.'
'ये सब सोच कर मैंने तय किया कि अब आईएएस छोड़ देते हैं. तब तक मेरे बच्चे 'सेटिल' हो गए थे, बेटी की शादी हो गई थी और मैं पेंशन पाने के योग्य भी हो गया था. मेरी तब 12 साल की नौकरी बची थी. मैंने आईएएस से इस्तीफ़ा दे दिया.'
आरंभिक झिझक के बाद उन्होंने जनता दल की सदस्यता गृहण कर ली. वो चंद्रशेखर के बहुत करीब हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह सत्ता में आए तो उन्होंने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के रूप में जगह दी, लेकिन उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'जब मैं राष्ट्रपति भवन में घुसा तो मुझे कैबिनेट सचिव टीएन सेशन का लिखा एक पत्र दिया गया. उसमें लिखा था कि राष्ट्रपति ने मेरी रा
1998 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो आरएसएस ने जसवंत सिंह के मंत्री बनने पर आपत्ति की, क्योंकि वो चुनाव हार गए थे. तब यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया. बाद में वो जसवंत सिंह की जगह भारत के विदेश मंत्री बने.
उसी दौरान उन्हें वाजपेई प्रतिनिधिमंडल के साथ रूस जाने का मौका मिला. यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'हम लोग क्रेमलिन जा रहे थे. वहाँ दो स्तरों पर बातचीत होनी थी. एक तो वाजपेई और पुतिन के बीच आमने सामने की बातचीत होने वाली थी, जिसमें मैं और ब्रजेश मिश्रा दोनों रहने वाले थे.
ब्रजेश मिश्रा वाजपेईजी की गाड़ी में उनके साथ ही बैठ गए क्योंकि रास्ते में उन्हें उनसे बात करनी थी. दूसरी गाड़ी में मैं और रूस में भारत के राजदूत रघुनाथ बैठे. वाजपेईजी की गाड़ी तो सीधे चली गई. हम लोगों को किसी दूसरे गेट पर लाया गया. वहाँ पर उन्होंने हमें कार से उतार कर हमारी सुरक्षा जाँच की. फिर उन्होंने हमें एक जगह ले जा कर बैठा दिया. मैंने कहा कि हमें बातचीत में शामिल होना है, लेकिन इसका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा.'
ज्य मंत्री के तौर पर नियुक्ति की है. पढ़ते ही मेरा दिल बैठ गया.'
'मैंने 10 सेकेंड के अंदर फ़ैसला किया कि मैं इस पद को स्वीकार नहीं करूँगा. मैं तुरंत पलटा. अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और उससे दृढ़ आवाज़ में कहा, 'तुरंत वापस चलो.'
'पार्टी में मेरी वरिष्ठता को देखते हुए और चुनाव प्रचार में मैंने जिस तरह का काम किया था, वी पी सिंह ने मेरे साथ न्याय नहीं किया था. सबसे बड़ी बात ये थी कि मुझे जूनियर मंत्री का पद दे कर उन्होंने मेरे नेता चंद्रशेखर का भी अपमान किया था.'
इसके बाद जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें वित्त मंत्री बनाया. लेकिन वो सरकार बहुत अधिक समय तक चली नहीं. सरकार गिरने के कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
य़शवंत सिन्हा बताते हैं, 'चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी समाप्ति की तरफ़ थी. उस समय मेरे पास दो विकल्प थे. एक था कांग्रेस और दूसरी भारतीय जनता पार्टी. नरसिम्हा राव बहुत चाहते थे कि मैं कांग्रेस में आऊँ. उनसे कई बार मुलाकात भी हुई. लेकिन मुझे कांग्रेस पार्टी में जाना अच्छा नहीं लगा.
एक 'कॉमन' मित्र ने मेरी मुलाकात आडवाणी जी से करवाई लेकिन पार्टी में जाने की कोई बात उनसे नहीं हुई. उसी ज़माने में जनता दल के सभी घटकों को एक करने की मुहिम भी चल रही थी.
'हमने तय किया कि हम हर दिन उन्हें पटना के किसी डाक बंगले में ले जाएंगे, जहाँ वो शाँति से फ़ाइलों पर दस्तख़त कर सकें. हम उन्हें अक्सर बिहार मिलिट्री पुलिस के फुलवारी शरीफ़ वाले गेस्ट हाउज़ ले जाते थे जहाँ कोई उनसे मिलने नहीं पहुंच सकता था.'
'वो अपनी पत्नी को गाँव में ही रखते थे. एक बार मुझे उनके गाँव जाने का मौका मिला था. वहाँ पर हमारे बैठने के लिए एक कुर्सी तक नहीं थी. उन्होंने ज़ोर दिया कि हम चाय पी कर जाएं. उन्होंने अपने हाथों से लकड़ी के चूल्हे में चाय बनाई. वो झोपड़ी में रहती थीं जहाँ आधुनिक जीवन की कोई भी चीज़ मौजूद नहीं थी.'
यशवंत सिन्हा आगे याद करते हैं, 'कर्पूरी ठाकुर बहुत बड़े हिंदी दाँ थे. उनके ज़माने में हर सरकारी काम हिंदी में किया जाता था, हाँलाकि उन्हें खुद अच्छी अंग्रेज़ी आती थी. केंद्रीय मंत्रियों और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री को भेजा जाने वाला हर पत्र हिंदी में होता था, लेकिन साथ ही उसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी भेजा जाता था.'
इसने महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद यशवंत सिन्हा आ
यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' एक दिन मैं और मेरी पत्नी हवाई जहाज़ से राँची से दिल्ली आ रहे थे. पटना में विमान में लालू प्रसाद यादव सवार हुए. मैंने उन्हें प्रणाम किया लेकिन उन्होंने प्रणाम का जवाब देना तो दूर मुझे पहचानने तक से इंकार कर दिया. दिल्ली में जब जहाज़ उतरा तो मेरे बगल में खड़े रहने के बावजूद उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की. मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि लालू ने आपकी बहुत उपेक्षा की है. लालूजी की इस हरकत को देखते हुए मैंने घर पहुंच कर तुरंत आडवाणीजी को फ़ोन कर कहा कि मैं आपसे तुरंत मिलना चाहता हूँ. कुछ दिनों बाद आडवाणी ने मुझे भारतीय जनता पार्टी में शामिल कर लिया और उन्होंने एक प्रेस कान्फ़्रेंस करके आलान किया कि मेरा बीजेपी में जाना पार्टी के लिए दीवाली गिफ़्ट है.'
ईएएस से इस्तीफ़ा दे कर जनसेवा करने का फ़ैसला किया. वो जयप्रकाश नारायण से बहुत प्रभावित थे, लेकिन जेपी चाहते थे कि वो तब तक आईएएस से इस्तीफ़ा न दें, जब तक उनकी आजीविका का प्रबंध न हो जाए.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'मुझे निराशा हुई जिस तरह दुमका में मेरे साथ मुख्यमंत्री ने व्यवहार किया था. मुझे लोगों ने मेरी बाकी ज़िम्मेदारियों के साथ ये कह कर कि एशियाई खेल आ रहे हैं दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन का अध्यक्ष बना दिया. फिर वहाँ एक नेता आ गए. उन्होंने वहाँ की फ़िज़ा बिगाड़ दी.'
'उनसे हमारी पटी भी नहीं. नतीजा ये हुआ कि वहाँ हड़ताल हो गई और मेरे लिए वो तैनाती ज़बरदस्ती गले का बोझ बन गई. इससे भी मुझे बहुत निराशा हुई. आईएएस में अक्सर होता है कि कोई भी नेता आपके साथ दुरव्यवहार कर सकता है और आप 'पब्लिकली' उसके ख़िलाफ़ बोल नहीं सकते हैं.'
'ये सब सोच कर मैंने तय किया कि अब आईएएस छोड़ देते हैं. तब तक मेरे बच्चे 'सेटिल' हो गए थे, बेटी की शादी हो गई थी और मैं पेंशन पाने के योग्य भी हो गया था. मेरी तब 12 साल की नौकरी बची थी. मैंने आईएएस से इस्तीफ़ा दे दिया.'
आरंभिक झिझक के बाद उन्होंने जनता दल की सदस्यता गृहण कर ली. वो चंद्रशेखर के बहुत करीब हो गए. जब विश्वनाथ प्रताप सिंह सत्ता में आए तो उन्होंने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के रूप में जगह दी, लेकिन उन्होंने इस पद को स्वीकार नहीं किया.
यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'जब मैं राष्ट्रपति भवन में घुसा तो मुझे कैबिनेट सचिव टीएन सेशन का लिखा एक पत्र दिया गया. उसमें लिखा था कि राष्ट्रपति ने मेरी रा
1998 में जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो आरएसएस ने जसवंत सिंह के मंत्री बनने पर आपत्ति की, क्योंकि वो चुनाव हार गए थे. तब यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया. बाद में वो जसवंत सिंह की जगह भारत के विदेश मंत्री बने.
उसी दौरान उन्हें वाजपेई प्रतिनिधिमंडल के साथ रूस जाने का मौका मिला. यशवंत सिन्हा याद करते हैं, 'हम लोग क्रेमलिन जा रहे थे. वहाँ दो स्तरों पर बातचीत होनी थी. एक तो वाजपेई और पुतिन के बीच आमने सामने की बातचीत होने वाली थी, जिसमें मैं और ब्रजेश मिश्रा दोनों रहने वाले थे.
ब्रजेश मिश्रा वाजपेईजी की गाड़ी में उनके साथ ही बैठ गए क्योंकि रास्ते में उन्हें उनसे बात करनी थी. दूसरी गाड़ी में मैं और रूस में भारत के राजदूत रघुनाथ बैठे. वाजपेईजी की गाड़ी तो सीधे चली गई. हम लोगों को किसी दूसरे गेट पर लाया गया. वहाँ पर उन्होंने हमें कार से उतार कर हमारी सुरक्षा जाँच की. फिर उन्होंने हमें एक जगह ले जा कर बैठा दिया. मैंने कहा कि हमें बातचीत में शामिल होना है, लेकिन इसका उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा.'
ज्य मंत्री के तौर पर नियुक्ति की है. पढ़ते ही मेरा दिल बैठ गया.'
'मैंने 10 सेकेंड के अंदर फ़ैसला किया कि मैं इस पद को स्वीकार नहीं करूँगा. मैं तुरंत पलटा. अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और उससे दृढ़ आवाज़ में कहा, 'तुरंत वापस चलो.'
'पार्टी में मेरी वरिष्ठता को देखते हुए और चुनाव प्रचार में मैंने जिस तरह का काम किया था, वी पी सिंह ने मेरे साथ न्याय नहीं किया था. सबसे बड़ी बात ये थी कि मुझे जूनियर मंत्री का पद दे कर उन्होंने मेरे नेता चंद्रशेखर का भी अपमान किया था.'
इसके बाद जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उन्हें वित्त मंत्री बनाया. लेकिन वो सरकार बहुत अधिक समय तक चली नहीं. सरकार गिरने के कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
य़शवंत सिन्हा बताते हैं, 'चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी समाप्ति की तरफ़ थी. उस समय मेरे पास दो विकल्प थे. एक था कांग्रेस और दूसरी भारतीय जनता पार्टी. नरसिम्हा राव बहुत चाहते थे कि मैं कांग्रेस में आऊँ. उनसे कई बार मुलाकात भी हुई. लेकिन मुझे कांग्रेस पार्टी में जाना अच्छा नहीं लगा.
एक 'कॉमन' मित्र ने मेरी मुलाकात आडवाणी जी से करवाई लेकिन पार्टी में जाने की कोई बात उनसे नहीं हुई. उसी ज़माने में जनता दल के सभी घटकों को एक करने की मुहिम भी चल रही थी.